ⓘ गिरीगंगा उपत्यका हिमाचल प्रदेश के तीन जनपदों शिमला, सोलन और सिरमौर में फैली है, और गिरी नदी इनके अधिकांश भागों से जलग्रहण कर यमुना में डालती है। इन क्षेत्रों के ..

                                     

ⓘ गिरीगंगा उपत्यका

गिरीगंगा उपत्यका हिमाचल प्रदेश के तीन जनपदों शिमला, सोलन और सिरमौर में फैली है, और गिरी नदी इनके अधिकांश भागों से जलग्रहण कर यमुना में डालती है। इन क्षेत्रों के लोग गिरी नदी को गिरीगंगा के नाम से पुकारते हैं। गिरीगंगा का जलग्रहण क्षेत्र २,६३,८६१.८६ हेक्टेयर में राजबन, उत्तराँचल और हिमाचल की सीमा पर यमुना से शिमला जनपद के जुब्बल कस्बे के ऊपर कूपड़ पर्वत तक फैला है।

गिरीगंगा, जुब्बल-रोहडू राष्ट्रीय मार्ग पर शिमला से ८० किलोमीटर दूर खड़ा-पत्थर नामक स्थान से लगभग ५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। शिमला जनपद में कूपड़ पर्वत से निकल कर गिरीगंगा दक्षिण-पश्चिम दिशा में ४० किलोमीटर की दूरी तय कर, सोलन के पास से पूरब दिशा की ओर ८८ किलोमीटर की यात्रा के बाद रामपुर घाट में यमुना नदी में मिलती है। इस यात्रा में यह नदी गिरीगंगा उपत्यका का निर्माण करती है, यहाँ इसके चार महत्वपूर्ण पहलूओं, पौराणिक, ऐतिहासिक, जैविक और पारिस्थितिक, का उल्लेख है।

                                     

1. पौराणिक

गिरीगंगा के उदगम व नामकरण से जुड़ी पौराणिक कथा इस प्रकार है। जुब्बल से एक योजन के फासले पर कूपड़ की पहाड़ी पर कोई मुनि तपस्या करने आया। उसके पास एक तुम्बे कमण्डल में गंगाजल था। अचानक वह तुम्बा गिर गया। उस मुनि के मुख से यह वचन निकले, कि हे गंगे अगर तैने मेरे पात्र से इस टिब्बे पर गिरना कबूल किया, तू गिरी है तो गिरीगंगा नाम से हमेशा बहती रहो। कालांतर इस रमणीय वनस्थली में जुब्बल के राजा कर्म चन्द्र ने गिरीगंगा का सत्कार एक तलाब बनाकर किया, और उसके मध्य में एक भव्य मंदिर में श्री गिरीगंगा की मूर्ती स्थापित की।

गिरीगंगा के उदगम स्थल के निकट बने मंदिर लोगों की आस्था के प्रतीक हैं, मुख्यतः यहाँ लोग बैसाखी के दिन स्नान करने आते हैं।

ठियोग के माईपुल में भी एक तीर्थ स्थल है जहाँ उसके आस-पास के लोग बैसाखी के पवित्र त्यौहापर गिरीगंगा में स्नान करते हैं। भोर में यहाँ के भूतेश्वर देवता स्नान करते हैं, और बाद में यह स्थल सभी लोगों के स्नान के लिए खुल जाता है।

इसी तरह बलग में, शिमला से ६५ किलोमीटर दूर, गिरीगंगा के तट पर, नागर शैली में बने प्राचीन मंदिर हैं। लोगों में विश्वास है कि इन मंदिरों का निमार्ण पांडवों ने किया था।

रेणुका, जो एक अभयारण्य भी है, पौराणिक कथा द्वारा परशु राम ओर उनकी माँ रेणुका से जुड़ा है। लोगों में मान्यता है कि वैदिक काल में जमदग्नि ऋषि अपनी पत्नी रेणुका के साथ यहाँ झील के किनारे रहते थे। कार्तिक मास में यहाँ से ९ किलोमीटर दूर जामू गाँव से परशु राम को पालकी में लाया जाता है, फिर गिरीगंगा में स्नान के बाद उन्हें अन्य देवताओं के साथ रेणुका झील के पास लाते हैं, जहाँ उनका अपनी माँ रेणुका से मिलन होता है।

                                     

2. ऐतिहासिक

गिरीगंगा के मंदिर जुब्बल के राजा कर्म चन्द्र ने बनाये थे, और इनका निर्माण सन १८५४ के एक-दो दशक बाद, जब कर्म चन्द्र को रानी विक्टोरिया के आदेश से जुब्बल की राजगद्दी मिली, हुआ होगा। हालांकि शिमला की पहाड़ी रियासतों के १९१० के गजेटियर में इन मंदिरों के बनवाने में जुब्बल के राजा पदम् चन्द्र का नाम है, किन्तु पदम् चन्द्र की वंशावली और मियां गोबर्धन सिंह की पुस्तक, दोनों में गिरीगंगा में चार मंदिरों का वर्णन है, जिनके बनाने वाले पदम् चन्द्र के पिता कर्म चन्द्र हैं। पहला मंदिर पत्थरों की चिनाई से बनाये गए तालाब के बीच में स्थित है और इसमें गंगा की मूर्ती स्थापित है। गिरिगंगा का पानी एक तरफ से पत्थर पर उकेरे गए किसी जंतु के सिर से तालाब में गिरता है। इसके ठीक पीछे दो छोटे-छोटे मंदिर हैं, एक शिव का तथा दूसरा विष्णु का।देखें प्लेट-१ पृष्ठ १२८ के सामने एक चौथा मंदिर काली का है, जो इन से कुछ दूर टीले पर बना है।

मोरान के अनुसार किसी समय मुग़ल शासन काल में गिरीगंगा उपत्यका का अधिकांश भाग सिरमौर रियासत में था, और कालसी वर्तमान उत्तराँचल में इसकी राजधानी थी। उसने आगे लिखा है कि गिरी उपत्यका में अपने राज्य को मज़बूत करते हुए, १६१० में सिरमौर के राजा ने गिरी के इस तराई के क्षेत्र को चुना, जहाँ तौंस नदी यमुना के साथ मिलती है। मियां गोबर्धन सिंह लिखते हैं कि सिरमौर के राजा उदित प्रकाश ने कालसी को अपनी राजधानी चुना, जहाँ अशोक का शीला लेख भी है।

इतिहासकार लक्ष्मण ठाकुर के अनुसार, यमुना घाटी में कालसी के पास से नागर शैली गिरीगंगा उपत्यका में फैली होगी, जिसके उदाहरण गिरीगंगा और बलग के मंदिर हैं।

अजय बहादुर सिंह लिखते हैं कि मुग़ल बादशाह औरंगजेब के समय राजा बुद्ध प्रकाश, जिन्होंने सिरमौपर १६५९ से १६७८ तक राज किया, नाहन से बरफ दिल्ली भेजते थे और उन्हें बर्फी राजा के नाम से जाना जाता था। यही नहीं वह इस क्षेत्र से कई किसम की जड़ी-बूटियाँ, शहद, कस्तूरी मुश्क नफा, तथा मोनाल मुर्ग ज़रीन आदि की सौगात भी जहांनारा को भेजते थे। और उन्होंने बादशाह औरंगजेब से गुहार लगाई थी कि कालसी को गढ़वाल के राजा से वापस लेने में उनकी सहयता की जाये।

अंग्रेजी शासन काल से हिमालय की जैविक सम्पदा, विशेषकर वनों के दोहन की शुरुआत हुई जिससे पहाड़ी रियासतें आर्थिक रूप से संपन्न हुई, जैसे जुब्बल जिसका गिरीगंगा उदगम स्थल, तथा सिरमौर जिसका गिरीगंगा उपत्यका के अधिकांश भाग, पर अधिकार था। भारत की स्वतंत्रता के बाद भी हिमालय के वनों का दोहन कम नहीं हुआ।

                                     

3. जैविक

सिंह, कोठारी और पाण्डे ने गिरीगंगा उपत्यका के तीन अभयारण्यों, चूड़धार, चैल और सिम्बलवाड़ा, में जंतुओं एवं पारिस्थितिकी का विस्तार से वर्णन किया है। उनका कहना है कि चूड़धार अभयारण्य गिरीगंगा के उदगम के पास का क्षेत्र है, जो वनों से अच्छादित है। इस क्षेत्र में हिमालय का कला भालू, तेंदुआ, हनुमान लंगूर, रहेसस बंदर, भारतीय साही, काकड़, और घोरल मुख्य जन्तु हैं। कस्तूरी मृग, जो इस क्षेत्र में बहुतायत में पाया जाता था अब शायद नहीं के बराबर है।

चैल अभयारण्य भी गिरीगंगा के जलग्रहण के क्षेत्र का मुख्य भाग है और बान, चीड़ और देवदार के वनों से ढका है। इसमें पाए जाने वाले जन्तु एवं वनस्पति चूड़धार से मिलते जुलते हैं।

सिम्बलवाड़ा अभयारण्य गिरीगंगा के यमुना से संगम के आस-पास का क्षेत्र है जहाँ साल के जंगल है जो कभी घने होंगे, किन्तु घनी आबादी के कारण अब परिवर्तित हो चुके हैं। इस अभयारण्य में शेर, तेंदुआ, हनुमान लंगूर, रहेसस बंदर, काकड़, चीतल, और सांभर पाए जाते हैं। लेखकों का मानना है कि सिम्बलवाड़ा में कभी हाथी भी आते थे।

कौलेट ने फलोरा सिम्लेंसिस में गिरीगंगा उपत्यका की वनस्पति का वर्णन किया है, जिसके परिचय में रायेल बाटेनिक गार्डन के हेम्सले लिखते हैं कि चूड़ इस क्षेत्र में १२००० फूट ऊंची छोटी है जिसका इस पुस्तक में बार-बार नाम आता है। इस क्षेत्र के जन्तुओं के बारे में और जानकारी शर्मा और सिद्धू द्वारा बनायी सूची में है।



                                     

4. पारिस्थितिक

गिरीगंगा के पौराणिक स्वरुप को देहरा दून के लोक विज्ञान संस्थान ने, कश्यप के जल उपयोग और संरक्षण के दिशा-निर्देशों से जोड़ते हुए, अनेक ऐसी पौराणिक कथाओं के सन्दर्भ में रखा है जो इस जलागम के पारिस्थितिकीय महत्व को उजागर करती है।

पहाड़ों पर बरफ, जिसका अभी मुग़ल काल के संदर्भ में जिक्र आया, का एक पहलू जलसंकट से जुड़ा है। पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा इस बात को जन-जन तक ले गए कि पहाड़ों में वनों का घटना, बरफ के जमाव में कमी, तथा भ-क्षरण आपस में जुड़े हैं।

विजय मिश्र की व्याख्या के अनुसार आकाश से गिरते जल की बूंदों का तीव्र वेग वाल्मीकि ने गंगा के तीव्र वेग से जोड़ा, और हिमालय के आच्छादित वनों की तुलना शिव की जटाओं से कर पौराणिक कथा रची। अनेक प्रकार के जीव-जंतुओं का वर्णन भी वाल्मीकि ने अपनी कथा में किया है। यही नहीं उसे पाताल तक ले गए, जिसके लिए सगर के ६०,००० मृत पुत्रों की मुक्ति और भगीरथ की तपस्या का कथानक जोड़ा।

गिरीगंगा उपत्यका, हिमालय का सबसे निकटवर्ती जलग्रहण क्षेत्र है, जो स्थानीय लोगों की जल की आपूर्ति ही नहीं करता बल्कि भारत की राजधानी दिल्ली की पानी की आपूर्ति से भी जुड़ा है। इस जलग्रहण क्षेत्र का बहुत छोटा सा भाग अंग्रेज़ों ने १९वीं शताब्दी में शिमला में पानी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए चिन्हित किया। बाद में इसे शिमला जल ग्रहण अभयारण्य के रूप में विकसित किया गया, और आज भी देवदारु के घने वन से ढका यह क्षेत्र शिमला के लिए स्वच्छ पानी का सबसे बड़ा स्रोत है, जबकि अन्य स्रोत प्रदूषण की चपेट में आते रहते हैं।

गिरी नदी में अनेक बहुउद्देश्य जल-विद्युत योजनायें बनी हैं, जिसमें गिरी, बाता तथा जलाल के पानी का उपयोग हो रहा है। गिरिगंगा उपत्यका हिमाचल प्रदेश के शिमला, सोलन और सिरमौर जिलों की संस्कृति का हिस्सा है।

                                     

4.1. पारिस्थितिक गिरीगंगा उदगम स्थल

हिमालय के वनों के दोहन की शुरुआत जो अंग्रेजों के शासन काल में शुरू हुई, भारत की स्वतंत्रता के बाद सघन होती चली गयी, जो पर्यावरण और विकास के टकराव के रूप में उभरी है। यह टकराव गिरीगंगा के उदगम स्थल के आस-पास भी सामने आया है, जहाँ वनों का काफी हिस्सा सेब के बागीचों में बदल दिया गया। माधव गाडगिल ने भारत के पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी में ऐसे बदलाव के मुद्दे को जनता के सामने रखा है।

वन अनुसंधान से जुड़े वैज्ञनिकों की खोज बताती है कि गिरीगंगा के उदगम स्थल के मिश्रित वनों में देवदार, कैल, रजत तालीशपत्र, प्रसरल, मौरू, चीड़ और खरशु के वृक्ष हैं। यह वन मृदा जैव कार्बन संचयन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। अर्थात यह मिश्रित वन, अन्य वनों की अपेक्षा, कार्बन को वायुमंडल में जाने से रोकने में सबसे अधिक योगदान देते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए ज़रूरी है।

आज दुनिया के सभी देश तापक्रम में वृद्धि और मौसम में बदलाव की समस्याओं से जूझ रहे हैं। वायुमंडल में बढ़ते तापक्रम और इससे होने वाले मौसम में बदलाव का मनुष्य के जीवन पर हानिकारक प्रभाव सभी के लिए चिंता की बात है, इसे ध्यान में रखकर विश्व के सभी देश २०१५ में पेरिस में मिले और कई समझौतों के प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किये, एक सामूहिक उद्देश्य रखा कि पृथ्वी के तापक्रम को औद्योगिकरण से पहले के स्तर पर लाना है।

इस सन्दर्भ में वायुमंडल में बढ़ती कार्बन की मात्रा एक बड़ा घटक है, क्योंकि यह पृथ्वी के चारों ओर तापक्रम को बढ़ाती है। इसे कम करने का एक रास्ता है कार्बन को जमीन में भंडार करके रखा जाये। इसमें कुछ विशेष पारिस्थितिकीय तंत्र ही योगदान देते हैं, जो गिरीगंगा के उदगम स्थल में है। किन्तु अब इसमें सेब के बागीचे फ़ैल गए हैं।

न्यायविदों की राय में गिरीगंगा उदगम स्थल के आस-पास, और हिमाचल के अन्य क्षेत्रों में, ग्रामीण लोगों द्वारा वन क्षेत्र में अतिक्रमण सही नहीं है, और उन्होंने नाजायज़ कब्जों को हटाने के आदेश दिए हैं।

दूसरी ओर, पर्यावरण की संस्था से जुड़े कुछ लोग हिमाचल में वनभूमि पर अतिक्रमण के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने और इस समस्या के शीघ्र समाधान के पक्षधर हैं। इस संदभ में किसान नेता राकेश सिंघा ने छोटे और गरीब बागवानों के हितों की अनदेखी की बात रखी, और वैकल्पिक व्यवस्था करने का सुझाव दिया।

फेलिक्स पेडल ने वनों के नज़दीक या वनों पर आश्रित लोगों, जैसे मध्य भारत के डोंगरिया कौंध, के लिए वैकल्पिक विकास को चुनौती माना है। गिरीगंगा के उदगम स्थल के आसपास विशेषकर पुन्दर परगना के गाँव के लोग, स्वाभीमानी और मेहनती हैं इसका वर्णन अंग्रेजों ने भी किया है। शर्मा ने इस ऐतिहासिक प्रसंग के बारे में जानकारी देते हुए लिखा कि गोरखों के नेता अमर सिंह थापा ने १९१० में इस क्षेत्र के गावों, मड़ाओग, जुब्बड़, घड़ीन, माटल, बामटा, ममवी, कशाह, आदि को लूटने की खुली छूट दी थी, पर इन गांववालों ने गोरखा सेना का मुकाबला किया। यह लोग लम्बे अरसे से विकास से वंचित रहे हैं।

पेरिस समझौते में इस बात को स्वीकार किया गया है कि विकासशील देशों के समुदायों, जो पर्यावरण संरक्षण से प्रभावित होते हैं, के लिए विकास के वैकल्पिक रास्ते खोजे जाएँ। इस तरह की समस्याओं का समाधान ज़रूरी है।

                                     
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