ⓘ गर्भकालीन मधुमेह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें ऐसी महिलाओं में, जिनमें पहले से मधुमेह का निदान हुआ हो, गर्भावस्था के समय रक्त में शर्करा के उच्च स्तर पाए जाते है ..

                                     

ⓘ गर्भकालीन मधुमेह

English version: Gestational diabetes

गर्भकालीन मधुमेह) एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें ऐसी महिलाओं में, जिनमें पहले से मधुमेह का निदान हुआ हो, गर्भावस्था के समय रक्त में शर्करा के उच्च स्तर पाए जाते हैं।

गर्भकालीन मधुमेह के साधारणतः बहुत कम लक्षण होते हैं और इसका निदान अधिकतर गर्भावस्था में जांच के समय किया जाता है। रोग की पहचान के लिए किए जाने वाले परीक्षणों से रक्त के नमूनों में ग्लूकोज़ के अनुपयुक्त उच्च स्तर का पता चलता है। गर्भकालीन मधुमेह अध्ययनाधीन आबादी के अनुसार सभी सगर्भताओं के 3-10% को प्रभावित करती है। इसका कोई विशेष कारण नहीं पाया गया है, लेकिन यह माना जाता है कि गर्भावस्था में उत्पन्न हारमोन स्त्री की इंसुलिन के प्रति प्रतिरोधकता को बढ़ा देते हैं, जिससे ग्लूकोज़-सह्यता में कमी हो जाती है।

गर्भकालीन मधुमेह से ग्रस्त स्त्रियों के गर्भ से जन्म लेने वाले शिशुओं में अनेक समस्याएं, जैसे - गर्भकालीन आयु की तुलना में अधिक आकार का होना जिससे प्रसव के समय कठिनाई हो सकती है, अल्प रक्त शर्करा और पीलिया होने का जोखिम बढ़ जाता है। गर्भकालीन मधुमेह का उपचार संभव है और पर्याप्त रूप से ग्लूकोज़ स्तर पर नियंत्रण प्राप्त करने वाली स्त्रियां इन जोखिमों को प्रभावी रूप से कम कर सकती हैं।

गर्भकालीन मधुमेह से ग्रस्त स्त्रियों को गर्भावस्था के बाद टाइप 2 मधुमेह मेलिटस होने का अधिक जोखिम होता है, जबकि उनकी संतान को बाल्यकाल का मोटापा औऱ आगे चलकर टाइप 2 मधुमेह होने की संभावना होती है। अधिकतर रोगियों का इलाज केवल आहार में परिवर्तन और मध्यम व्यायाम द्वारा किया जाता है किंतु कुछ लोगों को इंसुलिन समेत मधुमेह-निरोधी दवाएं लेनी पड़ती हैं।

                                     

1. वर्गीकरण

गर्भकालीन मधुमेह को "गर्भावस्था में किसी भी तरह की ग्लूकोज़ असह्यता की शुरूआत या प्रथम पहचान" के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह परिभाषा इस संभावना को ध्यान में रखती है कि रोगियों में मधुमेह पहले से हो पर इसका निदान हुआ हो, या गर्भावस्था में मधुमेह मेलिटस उत्पन्न हुई हो. निदान का इस बात से कोई संबंध नहीं है कि गर्भ की समाप्ति के बाद लक्षण कम होते हैं या नहीं.

प्रसवकालीन परिणामों के मधुमेह के प्रकारों के प्रभाव पर किए जाने वाले शोध का मार्ग प्रशस्त करने वाले प्रिसिला व्हाइट के नाम पर आधारित का प्रयोग ज्यादातर माता एवं भ्रूण के जोखिम का अनुमान लगाने के लिये किया जाता है। यह गर्भकालीन मधुमेह टाइप ए और गर्भाधान के पहले से मौजूद मधुमेह सगर्भपूर्व मधुमेह के बीच अंतर स्थापित करता है। इन दोनो समूहों को उनसे संबंधित जोखिम और उपचार के अनुसार आगे उपविभाजित किया गया है।

गर्भकालीन मधुमेह गर्भावस्था में उत्पन्न मधुमेह के 2 उपप्रकार हैं:

  • टाइप ए2 Type A2: असामान्य ओजीटीटी OGTT और भूखे रहने और/या भोजन के बाद असामान्य ग्लूकोज़ स्तर-इंसुलिन या अन्य दवाओं के द्वारा अतिरिक्त उपचार की आवश्यकता होती है।
  • टाइप ए1 Type A1: असामान्य मौखिक ग्लूकोज़ सह्यता परीक्षण ओजीटीटी OGTT) लेकिन भूखे रहने और भोजन के 2 घंटे बाद सामान्य रक्त ग्लूकोज़ स्तर होना; इसमें आहार का संशोधन ग्लूकोज़ स्तर को नियंत्रित करने के लिये पर्याप्त है।

गर्भाधान के पहले से मौजूद मधुमेह के दूसरे समूह को भी विभिन्न उपप्रकारों में विभाजित किया गया है।

                                     

2. जोखिम घटक

गर्भकालीन मधुमेह के विकसित होने के पारंपरिक जोखिम कारक निम्न हैं:

  • कोई पूर्व गर्भाधान, जिसमें बच्चे का जन्मभार उच्च रहा हो > 90वां सेंटाइल, या > 4000 ग्राम 8 पौंड12.8 औंस)
  • किसी प्रथम दर्जे के संबंधी में टाइप 2 मधुमेह का पारिवारिक इतिहास
  • माता की उम्र - स्त्री की उम्र के बढ़ने के साथ उसका जोखिम घटक भी बढ़ता है विशेषकर 35 वर्ष से अधिक की स्त्रियों के लिये
  • अधिक वजन, मोटापा या अत्यधिक मोटापा जोखिम को क्रमशः 2.1, 3.6 और 8.6 के कारक के द्वारा बढ़ा देता है।
  • गर्भकालीन मधुमेह या पूर्वमधुमेह, ग्लूकोज़ असह्यता, या भूखे रहने पर रक्तशर्करा की अधिकता का पहले कभी किया गया निदान
  • नस्लीय पृष्ठभूमि -
  • पिछली असफल प्रसूति का इतिहास

इसके अतिरिक्त, आंकड़े यह दर्शाते हैं कि धूम्रपानकर्ताओं में जीडीएम GDM का जोखिम दोगुना होता है। बहुपुटिक अंडाशय रोगसमूह भी एक जोखिम घटक है, हालांकि इससे संबंधित प्रमाण विवादास्पद हैं। कुछ अध्ययनों में और विवादास्पद जोखिम घटकों, जैसे छोटे कद, पर ध्यान दिया गया है।

जीडीएम GDM से ग्रस्त लगभग 40-60% स्त्रियों में कोई प्रत्यक्ष जोखिम घटक नहीं पाया जाता है, इसलिये कई लोग सभी स्त्रियों की जांच की सलाह देते हैं। गर्भकालीन मधुमेह से ग्रस्त स्त्रियों में कोई लक्षण नहीं होते हैं व्यापक जांच की एक और वजह, लेकिन कुछ स्त्रियों में अधिक प्यास, अधिक पेशाब होना, थकान, मतली और उल्टी, मूत्राशय का संक्रमण, फफूंदी का संक्रमण और धुंधली दृष्टि आदि देखे जा सकते हैं।

                                     

3. विकारीशरीरक्रिया

गर्भकालीन मधुमेह की निश्चित क्रियाविधि की जानकारी ज्ञात नहीं है। जीडीएम GDM का विशेष चिन्ह इंसुलिन के प्रति बढ़ी हुई प्रतिरोधकता है। ऐसा अनुमान है कि गर्भाधान के हारमोन और अन्य घटक इंसुलिन के इंसुलिन ग्राहक से बंधन की क्रिया में हस्तक्षेप करते हैं। यह हस्तक्षेप संभवतः इंसुलिन ग्राहक के पीछे के कोशिका संकेतक मार्ग के स्तर पर होता है।. चूंकि इंसुलिन अधिकांश कोशिकाओँ में ग्लूकोज़ के प्रवेश को बढ़ावा देता है, इंसुलिन-प्रतिरोध ग्लूकोज़ को उचित रूप से कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकता है। इसके परिणामस्वरूप ग्लूकोज़ रक्तप्रवाह में ही रह जाता है जिससे उसमें ग्लूकोज़ के स्तर बढ़ जाते हैं। इस प्रतिरोध से निपटने के लिये और इंसुलिन की जरूरत पड़ती है – सामान्य गर्भवस्था की अपेक्षा 1.5-2.5 गुना और अधिक इंसुलिन उत्पन्न होता है।

इंसुलिन प्रतिरोध गर्भावस्था के दूसरे त्रैमास में होने वाली सामान्य क्रिया है, जो उसके बाद टाइप 2 मधुमेह से ग्रस्त अगर्भवती रोगियों के स्तरों तक बढ़ जाती है। ऐसा समझा जाता है कि यह प्रक्रिया विकसित हो रहे भ्रूण के लिये ग्लूकोज़ की आपूर्ति निश्चित करती है। जीडीएम GDM से ग्रस्त स्त्रियों में एक इंसुलिन प्रतिरोध होता है, जिसकी पूर्ति वे अग्न्याशय की β-कोशिकाओं के बढ़े हुए उत्पादन के द्वारा नहीं कर सकतीं. अपरा के हारमोन और कुछ हद तक गर्भावस्था में बढ़े हुए वसा संग्रह इंसुलिन प्रतिरोध में मध्यस्थता करते हैं। कॉर्टीसॉल और प्रोजेस्टेरॉन मुख्य अपराधी होते हैं, पर मानवीय अपरा लैक्टोजेन, प्रोलैक्टिन और एस्ट्रेडियॉल भी इसमें भाग लेते हैं।

यह स्पष्ट नहीं है कि क्यों कुछ रोगी उनकी इंसुलिन की जरूरतों को संतुलित करने में असमर्थ होते हैं, जिससे उनमें जीडीएम GDM का विकास हो जाता है, इसकी टाइप 2 मधुमेह की तरह ही विभिन्न व्याख्याएं की गई हैं – स्वक्षमता, एकल जीन उत्परिवर्तन, मोटापा और अन्य क्रियाएं.

ग्लूकोज़ के जीएलयूटी3 GLUT3 वाहकों द्वारा सुगमित प्रसार द्वारा) अपरा में प्रवेश करने के कारण भ्रूण को उच्च ग्लूकोज़ स्तरों का सामना करना पड़ता है। इससे भ्रूण के इंसुलिन स्तर बढ़ जाते हैं इंसुलिन स्वतः अपरा के पार नहीं जा सकता है. इंसुलिन के विकास-उत्तेजक प्रभावों के कारण अत्यधिक विकास और एक बड़े शरीर की उत्पत्ति हो सकती है विराटकायता. जन्म के बाद, उच्च ग्लूकोज़ वातावरण गायब हो जाता है, जिससे उन नवजात शिशुओं में इंसुलिन का अधिक उत्पादन होता जाता है और रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर कम होने की स्थिति अल्परक्तशर्करा उत्पन्न हो सकती है।



                                     

4. जांच

परिभाषित परिस्थितियों में प्लाज्मा या सीरम में ग्लूकोज़ के उच्च स्तरों का पता लगाने के लिये कई जांच और निदानकारक परीक्षणों का प्रयोग किया जाता रहा है। इसकी एक विधि एक चरणबद्ध पद्धति है जिसके तहत जांच परीक्षण के से संदिग्ध परिणाम प्राप्त होने के बाद नैदानिक परीक्षण किया जाता है। इसके बदले में उच्च-जोखिम वाले रोगियों उदाहरणस्वरूप बहुपुटिक अंडाशय रोगसमूह या एकैंथोसिस निग्रिकाँस से ग्रस्त रोगी में प्रथम प्रसूतिपूर्व निरीक्षण के समय प्रत्यक्ष रूप से एक अधिक जटिल नैदानिक परीक्षण किया जा सकता है।

गैर चुनौतीपूर्ण रक्त ग्लूकोज़ परीक्षणों में रोगी को ग्लूकोज़ के घोल से चुनौती दिये बिना रक्त के नमूमों में ग्लूकोज़ के स्तरों को मापा जाता है। ग्लूकोज़ के स्तरों का निर्धारण निराहार, भोजन के 2 घंटे बाद या किसी भी समय किया जाता है। इसके विपरीत, चुनौती परीक्षणों में ग्लूकोज़ का घोल पिला कर रक्त में ग्लूकोज़ की मात्रा मापी जाता है – मधुमेह में यह मात्रा उच्च होती है। ग्लूकोज़ का घोल बहुत मीठा होता है जो कुछ स्त्रियों को पसंद नहीं आता–इसलिये कभी-कभी कृत्रिम स्वाद मिलाए जाते हैं। कुछ स्त्रियों को, खास तौपर उच्च ग्लूकोज़ स्तर होने पर, मतली का अनुभव हो सकता है।

                                     

4.1. जांच मार्ग

सबसे उपयुक्त जांच और निदान के तरीकों के विषय में, जनता के जोखिमों में भिन्नता, खर्चीलेपन और बड़े राष्ट्रीय जांच कार्यक्रमों के लिये आधारभूत प्रमाणों की कमी के कारण विचारों की भिन्नता है। सबसे विस्तृत व्यवस्था में पहली बार की मुलाकात में रैंडम रक्त ग्लूकोज़ परीक्षण, 24-28 सप्ताह के गर्भकाल में स्क्रीनिंग ग्लूकोज़ चुनौती परीक्षण और फिर यदि सभी परीक्षण सामान्य सीमा के बाहर होने पर ओजीटीटी OGTT का समावेश किया जाता है। अधिक संदेह होने पर इससे पहले भी जांच की जा सकती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में अधिकतर प्रसूतितज्ञ स्क्रीनिंग ग्लूकोज़ सह्यता परीक्षण के साथ सार्वभौमिक स्क्रीनिंग को प्राथमिकता देते हैं। युनाइटेड किंगडम में प्रसूति इकाइयां अकसर जोखिम घटकों और रैंडम रक्त ग्लूकोज़ परीक्षण पर भरोसा करती हैं। अमेरिकन डायबिटीज़ एसोसिएशन The American Diabetes Association और सोसाइटी ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन्स एण्ड गायनेकॉलॉजिस्ट्स ऑफ कनाडा Society of Obstetricians and Gynaecologists of Canada रोगी के कम जोखिम अर्थात् स्त्री की उम्र 25 वर्ष से कम हो और उसका बॉडी मास इंडेक्स 27 से कम हो तथा कोई व्यक्तिगत, जातीय या पारिवारिक जोखिम घटक न हों के होने को छोड़कर नियमित जांच की सिफारिश करते हैं। द कैनेडियन डायबिटीज़ एसोसिएशन The Canadian Diabetes Association और अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन्स एण्ड गायनेकॉलॉजिस्ट्स सार्वभौमिक स्क्रीनिंग की सिफारिश करते हैं। यू.एस. प्रिवेंटिव सर्विसेज़ टास्क फोर्स ने पाया है कि नियमित स्क्रीनिंग के पक्ष या विपक्ष में अपर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं।

                                     

4.2. जांच गैर-चुनौतीपूर्ण रक्त ग्लूकोज़ परीक्षण

जब भूखे रहने के बाद प्लाज्मा ग्लूकोज़ स्तर 126 मिग्रा/डीएल 7.0 मिलीमॉल/ली से अधिक हो, या किसी भी अवसर पर 200 मिग्रा/डीएल 11.1मिलीमॉल/ली से अधिक हो और अगले दिन इसकी पुष्टि हो जाए तो जीडीएम GDM का निदान हो जाता है और आगे किसी जांच की आवश्यकता नहीं होती. ये परीक्षण पहली प्रसूतिपूर्व निरीक्षण के समय किये जाते हैं। ये रोगी के लिये सुखद और सस्ते होते हैं, लेकिन मध्यम संवेदनशीलता, कम विशिष्टता और उच्च मिथ्या सकारात्मक दर के कारण अन्य परीक्षणों की अपेक्षा कम उपयोगी होते हैं।



                                     

4.3. जांच स्क्रीनिंग ग्लूकोज़ चुनौती परीक्षण

स्क्रीनिंग ग्लूकोज़ चुनौती परीक्षण जिसे कभी-कभी ओसुलिवान परीक्षण भी कहते हैं 24-28 सप्ताहों में किया जाता है और इसे मौखिक ग्लूकोज़ सह्यता परीक्षण ओजीटीटी OGTT) का सरलीकृत रूप माना जा सकता है। इसमें 50 ग्राम ग्लूकोज़ का घोल पीने के 1 घंटे बाद रक्त स्तरों की जांच की जाती है।

यदि 140 मिग्रा/डीएल 7.8 मिलीमॉल/ली की सीमा निर्धारित की जाए, तो जीडीएम GDM से ग्रस्त 80% स्त्रियों का निदान हो सकता है। यदि यह सीमा घटा कर 130 मिग्रा/डीएल कर दी जाए तो जीडीएम GDM के 90% मामलों का निदान हो सकता है, लेकिन इस स्थिति में अधिक स्त्रियों को अनावश्यक रूप से ओजीटीटी OGTT करना पड़ेगा.

                                     

4.4. जांच मौखिक ग्लूकोज़ सह्यता परीक्षण

ओजीटीटी OGTT रात भर 8 से 14 घंटों तक भूखा रहने के बाद सुबह किया जाना चाहिये. पिछले तीन दिनों में रोगी को अनियंत्रित आहार कम से कम 150 ग्राम कार्बोहाइड्रेट प्रतिदिन और असीमित शारीरिक गतिविधि करनी चाहिये. उसे जांच के दौरान बैठे रहना चाहिये और धूम्रपान नहीं करना चाहिये.

इस परीक्षण में ग्लूकोज़ युक्त घोल पिलाने के बाद शुरू में और फिर निश्चित अंतरालों पर ग्लूकोज़ को स्तर मापे जाते हैं।

अधिकतर नैशनल डायबिटीज़ डाटा ग्रुप एनडीडीजी NDDG) के निदान मापदंडों का प्रयोग किया जाता रहा है, लेकिन कुछ केंद्र कारपेंटर और कूस्टन मापदंडों पर विश्वास करते हैं, जिसमें सामान्य की सीमा कम रखी गई है। एनडीडीजी NDDG मापदंडों की तुलना में कारपेंटर और कूस्टन मापदंडों द्वारा अधिक खर्च पर और बिना बेहतर प्रसूतिपश्चात् परिणामों के प्रमाण के, 54 प्रतिशत अधिक गर्भवती स्त्रियों में गर्भकालीन मधुमेह का निदान होता है।

अमेरिकन डायबिटीज़ एसोसिएशन 100 ग्राम ग्लूकोज़ के ओजीटीटी OGTT के समय निम्न आंकड़ों को असामान्य मानता है:

  • 1 घंटे का रक्त ग्लूकोज़ स्तर ≥180 mg/dl 10 mmol/L
  • 2 घंटे रक्त ग्लूकोज स्तर 155 मिलीग्राम ≥/डेसीलीटर 8.6 mmol/एल
  • 3 घंटों का रक्त ग्लूकोज़ स्तर ≥140 mg/dl 7.8 mmol/L
  • निराहार रक्त ग्लूकोज़ स्तर ≥95 mg/dl 5.33 mmol/L

एक वैकल्पिक परीक्षण में 75 ग्लकोज का प्रयोग करके पहले और 1 व 2 घंटों के बाद के रक्त ग्लूकोज़ स्तरों को मापा जाता है तथा समान संदर्भ मानों का प्रयोग किया जाता है। इस परीक्षण द्वारा जोखिम य़ुक्त कम स्त्रियों की पहचान होगी और इस परीक्षण व 3 घंटे के 100 ग्राम ग्लूकोज़ परीक्षण के मध्य केवल हल्की सी सहमति दर है।

गर्भकालीन मधुमेह का पता लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले ग्लूकोज़ के मानों का निर्धारण सबसे पहले ओसुलिवान और महान 1964 ने भविष्य में टाइप 2 मधुमेह के विकसित होने के जोखिम पता लगाने के लिए बनागए एक पूर्वव्यापी समूह अध्ययन 100 ग्राम ग्लूकोज़ ओजीटीटी OGTT का प्रयोग करके) में किया था। इन मानों को पूर्ण रक्त का प्रयोग करके किया गया और इसके सकारात्मक होने के लिये दो परिणामों को इस मान से अधिक आना आवश्यक था। आगे प्राप्त जानकारी से ओसुलिवान के मापदंडों में संशोधन किये गए। जब रक्त ग्लूकोज़ के निर्धारण के तरीके पूर्ण रक्त से शिरा के प्लाज्मा नमूनों में बदले तो जीडीएम GDM के मापदंड भी बदल गए।



                                     

4.5. जांच मूत्र ग्लूकोज परीक्षण

जीडीएम GDM से ग्रस्त स्त्रियों के मूत्र में उच्च ग्लूकोज़ स्तर ग्लुकोसूरिया हो सकते हैं। यद्यपि डिपस्टिक परीक्षण का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है, इसका निष्पादन अच्छा नहीं है और नियमित डिपस्टिक परीक्षण के बंद कर देने पर भी सार्वभौमिक जांच के समय अल्पनिदान नहीं देखा गया है। गर्भावस्था में बढ़ी हुई ग्लॉमेरूलार फिल्ट्रेशन दर के कारण कुछ 50% स्त्रियों के मूत्र में डिपस्टिक परीक्षणों में ग्लूकोज़ पाया जाता है। जीडीएम GDM के लिये ग्लुकोसूरिया की संवेदनशीलता पहले 2 त्रैमासिकों में केवल 10% के करीब होती है और सकारात्मक पूर्वानुमान मूल्य लगभग 20% है।

                                     

5. प्रबंधन

इलाज का उद्देश्य माता और बच्चे में जीडीएम GDM के जोखिमों को कम करना है। वैज्ञानिक तथ्यों द्वारा यह दर्शाया जाने लगा है कि ग्लूकोज़ के स्तरों को नियंत्रित करने से भ्रूण की गंभीर जटिलताओं जैसे विराटकायता को घटाया व माता के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाया जा सकता है। दुर्भाग्य से, जीडीएम GDM के उपचार के साथ ही अधिक शिशुओँ को नवजात शिशु वार्डों में भर्ती तथा अधिक बार प्रसवक्रिया को प्रेरित किया जाने लगा है और न ही सीजेरियन सेक्शन की दरों व प्रसवकालीन मृत्युदर में कोई कमी आई है। यह जानकारी अभी हाल की ही है और विवादास्पद है।

प्रसव के 2-4 महीनों बाद दोबारा ओजीटीटी OGTT करके यह पुष्टि की जानी चाहिये कि मधुमेह समाप्त हो गया है। इसके बाद टाइप 2 मधुमेह के लिये नियमित जांच की सलाह दी जाती है।

यदि मधुमेह का आहार या जी.आई. आहार, व्यायाम और मौखिक दवाईयां ग्लूकोज़ को स्तरों को नियंत्रित करने में अपर्याप्त हों तो इंसुलिन उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है।

विराटकायता के विकास को गर्भवस्था में सोनोग्राफी द्वारा परखा जा सकता है। मृतजन्म के इतिहास वाली व उच्च रक्तचाप से ग्रस्त स्त्रियों का, जो इंसुलिन का प्रयोग कर रही हों, अपरोक्ष मधुमेह की तरह उपचार किया जाता है।



                                     

5.1. प्रबंधन जीवनशैली

गर्भावस्था के पहले सलाह उदा.निवारक फोलिक एसिड पूरकों के बारे में और बहुआयामीय उपचार गर्भावस्था के अच्छे परिणामों के लिये महत्वपूर्ण है। अधिकांश स्त्रियां अपने जीडीएम GDM को आहार-परिवर्तन और व्यायाम द्वारा नियंत्रित कर सकती हैं। रक्त ग्लूकोज़ स्तरों की स्वयं जांच से उपचार का मार्गदर्शन किया जा सकता है। कुछ स्त्रियों को मधुमेहनिरोधक दवाओं, अधिकतर इंसुलिन-उपचार की आवश्यकता पड़ती है।

किसी भी आहार का गर्भावस्था के लिये पर्याप्त कैलोरियां, आदर्श रूप से सरल कार्बोहाइड्रेटों को छोड़कर, 2000-2500 किलो कैलोरी उपलब्ध करने में सक्षम होना आवश्यक है। आहार के संशोधनों का मुख्य उद्देश्य रक्त में ग्लूकोज़ के शिखरों को न बनने देना है। ऐसा कार्बोहाइड्रेट के सेवन को सारे दिन में भोजन और नाश्ते के बीच फैलाकर और धीमे मुक्त होने वाले कार्बोहाइड्रेट स्रोतों का प्रयोग करके किया जा सकता है–इसे जी.आई.डायट का नाम दिया गया है। चूंकि इंसुलिन असह्यता सबसे ज्यादा सुबह के समय होती है, इसलिये नाश्ते के कार्बोहाइड्रेटों को अधिक नियंत्रित करना चाहिये.

यद्यपि जीडीएम GDM के लिये किसी विशिष्ट व्यायाम कार्यक्रम की रचना नहीं की गई है, तो भी मध्यम तीव्र शारीरिक व्यायाम की सलाह दी जाती है।

हाथ में पकड़े जाने वाले कैपिलरी ग्लूकोज़ सिस्टम के प्रयोग से स्वतः नियंत्रण किया जा सकता है। इन ग्लूकोमीटरों द्वारा अनुपालन काफी कम हो सकता है। आस्ट्रेलेशियन डायाबिटीज सोसाइटी द्वारा दी गई लक्ष्य श्रेणियां निम्न हैं:

  • निराहार कैपिलरी रक्त ग्लूकोज़ स्तर