ⓘ मुक्त ज्ञानकोश. क्या आप जानते हैं? पृष्ठ 97

पात्र (कलाशास्त्र)

पात्र किसी कहानी में कोई व्यक्ति या कोई अन्य जीव होता हैं। पात्र पूरी तरह कपोलकल्पित हो सकता है या वास्तविक जीवन के किसी व्यक्ति पर आधारित हो सकता है, जिस मामले में "कपोलकल्पित" बनाम "वास्तविक" पात्र का भेद किया जा सकता हैं।

मानज़ाई

मानज़ाई जापान की मनोरंजन संस्कृति में व्यंग्य-प्रदर्शन की एक पारंपरिक शैली है। इसमें आमतौपर दो कलाकार भाग लेते हैं। एक त्सुक्कोमी कहलाता है और उसका काम सीधा बात करना होता है और दूसरा बोके कहलाता है और वह मसख़री करता है। यह भारत व पाकिस्तान की उस् ...

मैकबेथ

द ट्रेजडी ऑफ मैकबेथ एक राज-हत्या और उसके बाद की घटनाओं पर विलियम शेक्सपियर द्वारा लिखा गया एक नाटक है, या संक्षेप में कहें तो मैकबेथ शेक्सपियर की एक कृति है। यह शेक्सपियर का सबसे छोटा शोकान्त नाटक है और माना जाता है कि इसे 1603 और 1603 के बीच किस ...

रत्नावली

रत्नावली एक विदुषी कन्या थी, जिनका जन्म सम्वत्- 1577 विक्रमी में जनपद- कासगंज के सोरों शूकरक्षेत्र अन्तर्वेदी भागीरथी गंगा के पश्चिमी तटस्थ बदरिया नामक गाँव में हुआ था। विदुषी रत्नावली के पिता का नाम पं॰ दीनबंधु पाठक एवं माता दयावती थीं। विदुषी र ...

रोमियो और जूलियट

शेक्सपीयर द्वारा लिखे गये प्रसिद्ध नाटकों में से एक है रोमियो एंड जूलियट I अपने करियर के शुरुआती दिनों शेक्सपियर ने ये नाटक लिखा था जो कि एक लड़का और एक लड़की की प्रेम कहानी और उनकी दुखांत मौत पर आधारित है I नाटक एक इटालियन कहानी पर आधारित है I

शंकुक (भरत नाट्यशास्त्र के व्याख्याता)

शंकुक भरत नाट्यशास्त्र के व्याख्याता। इनकी व्याख्या प्राप्त नहीं है पर अभिनवभारती में उसका उल्लेख है। भरत के रससूत्र की इन्होंने जो व्याख्या की है वह "अनुमितिवाद" नाम से प्रसिद्ध है। भट्ट लोल्लट के उत्पत्तिवाद का तथा सहृदयों में रसानुभव न माननेवा ...

सुखान्त नाटक

ऐसे नाटक जिनके अन्त में नायक अपने विरोधियों को पराजित करके या मारकर विजयी होता है, सुखान्त नाटक कहलाते हैं। इनमें सत्य पर असत्य की विजय होती है। भारतीय साहित्य में अधिकांश नाटक सुखान्त ही हैं।

हयवदन (नाटक)

हयवदन १९७२ में गिरीश कर्नाड के द्वारा कन्नड़ भाषा में लिखा गया एक बहुत प्रसिद्ध नाटक हैI यह नाटक जर्मनी के लेखक थॉमस मान के द्वारा लिखे गये नावेल ट्रांसपोज़ड हेड्स पर आधारित हैI

अरविन्द गौड़

अरविन्द गौड़, भारतीय रंगमंच निदेशक, सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिक रंगमंच में अपने काम के लिए जाने जाते हैं। अरविंद गौड़ के नाटक समकालीन हैं। व्यापक सामाजिक राजनीतिक मुद्दों - सांप्रदायिकता, जातिवाद, सामंतवाद, घरेलू हिंसा, राज्य के अपराध, सत्ता की ...

इब्राहीम अलकाजी

इब्राहीम अलकाजी-भारतीय रंगमंच निदेशक और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के पूर्व निदेशक है। ऊन्होने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के साथ कई नाटकों का निर्देशन किया। प्रसिद्ध प्रस्तुतियों, गिरीश कर्नाड का तुगलक, मोहन राकेश का आश़ाड् का एक दिन और धर्मवीर भारती का अं ...

किरण भटनागर

किरण भटनागर जन्म -February 8, 1951 भारतीय रंगकर्मी, लेखक और निर्देशक। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अध्ययन। भारतीय नाट्य संघ से जुडी थी। वर्तमान मै संगीत नाटक अकादमी में उपसचिव। किरण भटनागर द्वारा संपादित जे. एन. कौशल के संस्मरणों का संग्रह दर्द आया ...

गोविंद पुरुषोत्तम देशपांडे

गोविंद पुरुषोत्तम देशपांडे, जिन्हें जीपी देशपांडे, गोविंद देशपांडे, गोपु और जीपीडी के नाम से भी जाना जाता था, भारतीय राज्य महाराष्ट्र के एक मराठी नाटककार थे। उनका जन्म नासिक में हुआ। उन्होंने नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के "पूर्व ...

जे० ऍन० कौशल

जे.एन.कौशल - सुप्रसिद्ध भारतीय रंगकर्मी, लेखक और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा रंगमंडल के के पूर्व प्रमुख थे। उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन और हिन्दी अनुवाद भी किया। वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अध्ययन फिर अध्यापन और कमला देवी चट्टोपाध्याय के साथ भारतीय ...

दिनेश ठाकुर

दिनेश ठाकुर - रंगमंच निदेशक, टेलीविजन, रंगमंच और हिन्दी फिल्म अभिनेता है। बासु चटर्जी की फिल्म रजनीगन्था के लिये फ़िल्म फेयर पुरस्कार। वह मुंबई में अन्क सन्स्था के निर्देशक है।

नाग बोडस

नाग बोडस एक लोकप्रिय भारतीय नाटककाऔर हिन्दी कथाकार थे। प्रमुख नाटक खुब्सुरत बहू टीन -ट्प्पर तीन नाटक अम्मा तुझे सलाम क्रिति-विक्रिति न्रर -नारी उर्फ् बाबा लोचन दास अम्मा तुझे सलाम स्वर्गीय श्री नाग Bodas द्वारा लिखित सलाम एक सामाजिक व्यंग्य नाटक ...

प्रसन्ना

प्रसन्ना -, प्रमुख भारतीय रंगमंच निर्देशक और नाटककार। वह एक आधुनिक कन्नड़ थिएटर के अग्रदूत और् नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के स्नातक है। वह कर्नाटक की नाट्य संस्था समुदाय के संस्थापक है। सातवे दशक मैं प्रसन्ना ने कन्नड़ रंगमंच को एक रचनात्मक दिशा दी। व ...

प्रिया तेंडुलकर

भारत की पहली टीवी स्टार प्रिया तेंडुलकर ने अनेक फिल्मों व टीवी धारावाहिकों में भूमिका निभाई पर संभवतः वे संपूर्ण जीवन अपने सबसे पहले टीवी अवतार "रजनी" के नाम से ही बेहतर पहचानी जाती रहीं। 1985 में निर्मित व बासू चटर्जी द्वारा निर्देशित इस धारावाह ...

बलवन्त ठाकुर

बलवन्त ठाकुर भारत के एक नाट्यकर्मी एवं विद्वान है जिनके प्रयासों से डोगरी रंगमंच को अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिल सकी है। इसके लिए सन २०१३ में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

ब॰ व॰ कारन्त

बी.वी. कारंत - भारत के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, निर्देशक, अभिनेता, लेखक, फिल्म निर्देशक और संगीतकार थे। कारन्त आधुनिक भारतीय रंगमंच और कन्नड़ की नई लहर सिनेमा के अग्रदूतों में से थे। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अध्ययन और बाद मे उसके निदेशक बने। बहुत सा ...

महेश दत्ताणी

महेश दत्ताणी भारतीय नाटककाऔर रंगमंच व फिल्म निदेशक है। वह अंग्रेज़ी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक नाटक फ़ाइनल सॉल्यूशन्स एंड अदर प्लेज़ के लिये उन्हें सन् 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

राजेश कुमार

राजेश कुमार - जनवादी नाटककार, का जन्म -11 जनवरी 1958 पटना, बिहार में हुआ। राजेश कुमार नुक्कड़ नाटक आंदोलन के शुरुआती दौर 1986 से सक्रिय है। अब तक दर्जनों नाटक एवं नुक्कड़ नाट्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आरा की नाट्य संस्था युवानीति, भागलपुर की ...

विजय तेंडुलकर

विजय तेंडुलकर प्रसिद्ध मराठी नाटककार, लेखक, निबंधकार, फिल्म व टीवी पठकथालेखक, राजनैतिक पत्रकाऔर सामाजिक टीपकार थे। भारतीय नाट्य व साहित्य जगत में उनका उच्च स्थान रहा है। वे सिनेमा और टेलीविजन की दुनिया में पटकथा लेखक के रूप में भी पहचाने जाते हैं।

स्वदेश दीपक

स्वदेश दीपक एक भारतीय नाटककार, उपन्यासकाऔर लघु कहानी लेखक है। उन्होंने १५ से भी अधिक प्रकाशित पुस्तके लिखी हैं। स्वदेश दीपक हिंदी साहित्यिक परिदृश्य पर १९६० के दशक के मध्य से सक्रिय है। उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की ...

हबीब तनवीर

हबीब तनवीर भारत के मशहूर पटकथा लेखक, नाट्य निर्देशक, कवि और अभिनेता थे। हबीब तनवीर का जन्म छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था, जबकि निधन 8 जून,2009 को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ। उनकी प्रमुख कृतियों में आगरा बाजार चरणदास चोर शामिल है। उन्हों ...

अम्बिका प्रसाद दिव्य

श्री अम्बिका प्रसाद दिव्य शिक्षाविद और हिन्दी साहित्यकार थे। उनका जन्म अजयगढ़ पन्ना के सुसंस्कृत कायस्थ परिवार में हुआ था। हिन्दी में स्नातकोत्तर और साहित्यरत्न उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने मध्य प्रदेश के शिक्षा विभाग में सेवा कार्य प्रारंभ ...

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद ३० जनवरी १८८९ - १५ नवंबर १९३७, हिन्दी कवि, नाटककार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिन्दी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव् ...

दूधनाथ सिंह

दूधनाथ सिंह ने अपनी कहानियों के माध्यम से साठोत्तरी भारत के पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक एवं मानसिक सभी क्षेत्रों में उत्पन्न विसंगतियों को चुनौती दी।

नारायण प्रसाद बेताब

नारायणप्रसाद बेताब नाटककार, फिल्म कथाकार थे। अल्फ्रेड थिएट्रिकल कम्पनी नामक एक पारसी थिएटर कम्पनी ने इन्हे अपना नाट्यकार नियुक्त किया था। १९३० के दशक की लगभग दो दर्जन फिल्मों के लिए उन्होने गीतों की भी रचना की।

नारायणप्रसाद बेताब

आदरणीय पंडित नारायण प्रसाद बेताब जी की कलम माँ सरस्वती साक्षात निवास स्थान प्रकट होता है, आप के लिए बुलंदशहर, एक शहर औरंगाबाद के समीप संवत् १९२९ में ब्रेट ब्राह्मण परिवार में वह पैदा हुआ था. बचपन से, अंत्यानुप्रासवाला का शौक था. औरंगाबाद पंडित वर ...

माधव शुक्ल

माधव शुक्ल हिन्दी साहित्यकार थे। वे प्रयाग के निवासी और मालवीय ब्राह्मण थे। इनका कंठ बड़ा मधुर था और ये अभिनय कला में पूर्ण दक्ष थे। ये सफल नाटककार होने के साथ ही साथ अच्छे अभिनेता भी थे। इनकी राष्ट्रीय कविताओं के दो संग्रह भारत गीतंजलि और राष्ट् ...

मोहन राकेश

मोहन राकेश ८ जनवरी १९२५ - ३ जनवरी, १९७२ नई कहानी आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर थे। पंजाब विश्वविद्यालय से हिन्दी और अंग्रेज़ी में एम ए किया। जीविकोपार्जन के लिये अध्यापन। कुछ वर्षो तक सारिका के संपादक। आषाढ़ का एक दिन,आधे अधूरे और लहरों के राजहंस के ...

लक्ष्मीनारायण लाल

लक्ष्मीनारायण लाल हिन्दी नाटककार, एकांकीकार एवं समीक्षक होने के साथ-साथ कहानीकार एवं उपन्यासकार भी थे। साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन करने के बावजूद सर्वाधिक ख्याति उन्हें नाटककार के रूप में मिली। समीक्षक के रूप में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण है।

वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति

वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ये भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित एक नाटक है। इस प्रहसन में भारतेंदु ने परंपरागत नाट्य शैली को अपनाकर मांसाहार के कारण की जाने वाली हिंसा पर व्यंग्य किया गया है। नाटक का आरम्भ नांदी के दोहा गायन के साथ हुआ है - बहु बकरा ...

शंकर शेष

शंकर शेष हिन्दी की साठोत्तरी पीढ़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार थे। समकालीन जीवन की ज्वलंत समस्याओं से जूझते व्यक्ति की त्रासदी शंकर शेष के बहुसंख्यक नाटकों के केंद्र में रहती है। वे मोहन राकेश के बाद की पीढ़ी के महत्वपूर्ण नाटककार के रूप में मान्य हैं। ...

छऊ नृत्य

छाउ नृत्य मुख्य तरीके से क्षेत्रिय त्योहारो मे प्रदर्शित किया जाता है। ज्यादातर वसंत त्योहार के चैत्र पर्व पे होता है जो तेरह दिन तक चलता है और इसमे पुरा सम्प्रदाय भाग लेता है। इस नृत्य मे सम्प्रिक प्रथा तथा नृत्य का मिश्रन है और इसमे लडाई कि तकन ...

कथकली

कथकली मालाबार, कोचीन और त्रावणकोर के आस पास प्रचलित नृत्य शैली है। केरल की सुप्रसिद्ध शास्त्रीय रंगकला है कथकली। 17 वीं शताब्दी में कोट्टारक्करा तंपुरान ने जिस रामनाट्टम का आविष्कार किया था उसी का विकसित रूप है कथकली। यह रंगकला नृत्यनाट्य कला का ...

मीनाक्षी चितरंजन

मीनाक्षी चितरंजन भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना, शिक्षक और कोरियोग्राफर हैं। उन्हें शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम के पांडनल्लूर शैली के प्रतिपादक के रूप में जाना जाता है। वह कलादीक्षा की संस्थापक हैं, जो भरतनाट्यम को बढ़ावा देने वाली संस्था है और पांडनल ...

शर्मिला विश्वास

शर्मिला विश्वास ओड़िसी की प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना और कोरियोग्राफर हैं। वह गुरु केलुचरण महापात्र की शिष्या हैं। 2012 में, शर्मिला को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसे भारत की संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी ...

स्वाति भिसे

स्वाति "पद्म विभूषण" सोनल मानसिंह की पहली शिष्या हैं। नई दिल्ली में सेंटर ऑफ इंडियन क्लासिकल डांस में अपने पहले प्रदर्शन के बाद से, उन्होंने दुनिया भर के स्थानों पर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया है। जिसमें नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स इंडिय ...

मणिपुरी नृत्य

मणिपुरी नृत्य भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है। इसका नाम इसकी उत्पत्तिस्थल के नाम पर पड़ा है। यह नृत्य मुख्यतः हिन्दू वैष्णव प्रसंगों पर आधारित होता है जिसमें राधा और कृष्ण के प्रेम प्रसंग प्रमुख है। मणिपुरी नृत्‍य भारत के अन्‍य नृत्‍य रूपों से ...

यक्ष (कला उत्सव)

यक्ष एक वार्षिक कला उत्सव है जिसे, ईशा फाउंडेशन, ईशा योग केंद्र, कोयंबतूर में आयोजित करता है। जनवरी २०१० में शुरू किया गया यक्ष, भारत के विख्यात कलाकारों द्वारा संगीत और नृत्य का प्रदर्शन करता है। यक्ष, भारत के पारंपरिक संगीत और नृत्य को प्रचलित ...

अमरावती की कला

अमरावती की कला एक प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय कला है। आधुनिक आंध्र प्रदेश में स्थित अमरावती जैन मंदिर कला शैली के लिए विख्यात है। अमरावती कला का विकास एहोल राजवंश शासक सातवाहन द्वारा विकसित शैली है। इस शैली में बुद्ध के विहारों को बताया गया है। यह शै ...

कुषाण कला

कुषाण कला कुषाण वंश के काल में लगभग पहली शताब्दी के अंत से तीसरी शताब्दी तक उस क्षेत्र में सृजित कला का नाम है, जो अब मध्य एशिया, उत्तरी भारत, पाकिस्तान और अफ़्गानिस्तान के कुछ भागों को समाहित करता है। कुषाणों ने एक मिश्रित संस्कृति को बढ़ावा दिय ...

गान्धार कला

गांधार कला एक प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय कला है। इस कला का उल्लेख वैदिक तथा बाद के संस्कृत साहित्य में मिलता है। सामान्यतः गान्धार शैली की मूर्तियों का समय पहली शती ईस्वी से चौथी शती ईस्वी के मध्य का है तथा इस शैली की श्रेष्ठतम रचनाएँ ५० ई० से १५० ई ...

गुप्तकालीन कला

गुप्त कला का विकास भारत में गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में हुआ। इस काल की वास्तुकृतियों में मंदिर निर्माण का ऐतिहासिक महत्त्व है। बड़ी संख्या में मूर्तियों तथा मंदिरों के निर्माण द्वारा आकार लेने वाली इस कला के विकास में अनेक मौलिक तत्व देखे जा स ...

जामदानि

जामदानि, बंगाल के सबसे महीन मलमल वस्त्र है। प्राचीन काल से यह बंगाल में जामदानि साड़ियाँ स्त्रियों की प्रिय वस्तु रही है। आज भी बांग्लादेश के नारायणगंज जिले के दक्षिणी रूपसी में जामदानि का उत्पादन होता है। जामदानि को बुनने की कला को यूनेस्को ने म ...

प्राचीन भारतीय कलाएँ

प्राचीन भारत में अनेकों कलाएं प्रचलित थीं। उनके अंश आज देखने को मिलते हैं। इनमें से कुछ निम्न हैं:- अजन्ता की चित्रकला सिजिरिया के बौद्ध चित्र स्तूप दक्षिण भारत की कला पल्लव कला बौद्ध मूर्ति कला सिन्धु कला जैन कला मूर्ति कला अंगकोरवाट मथुरा कला ए ...

बौद्ध मूर्ति कला

बहुत प्रसिद्ध हैं। आज भी उनकी मुर्तिया जमीन के अन्दर से नीकलती है बद्ध की मुर्ति हमे शुंग काल से मिलती है भरहुत 200 ईसा पूर्व लेकिन सिर्फ प्रतीक के रुप मे जैसे कमल,हाथी, छत्र लिये खाली पीठ वाला घोड़ा, पद-चिह्न,बोधिबृक्ष, स्तूप, ये हिनयान के प्रती ...

मथुरा की मूर्तिकला

मथुरा में लगभग तीसरी शती ई०पू० से बारहवीं शती ई० तक अर्थात डेढ़ हजार वर्षों तक शिल्पियों ने मथुरा कला की साधना की जिसके कारण भारतीय मूर्ति शिल्प के इतिहास में मथुरा का स्थान महत्त्वपूर्ण है। कुषाण काल से मथुरा विद्यालय कला क्षेत्र के उच्चतम शिखर ...

मौर्य कला

मौर्य कला का विकास भारत में मौर्य साम्राज्य के युग में हुआ। सारनाथ और कुशीनगर जैसे धार्मिक स्थानों में स्तूप और विहार के रूप में स्वयं सम्राट अशोक ने इनकी संरचना की। मौर्य काल का प्रभावशाली और पावन रूप पत्थरों के इन स्तम्भों में सारनाथ, इलाहाबाद, ...